60 साल बाद भी नहीं मिला जमीन का मालिकाना हक: दंडकारण्य परियोजना के पुनर्वासित परिवारों ने उठाई न्याय की मांग, राज्यपाल के नाम सौंपा ज्ञापन
बांग्लादेश से आए विस्थापित परिवारों का सवाल— जब जमीन पर पीढ़ियां गुजर गईं, तो अब तक रजिस्ट्री और भूमिस्वामी अधिकार क्यों नहीं?

जगदलपुर
दंडकारण्य परियोजना के तहत बसाए गए हजारों पुनर्वासित परिवारों की दशकों पुरानी भूमि अधिकार की मांग एक बार फिर जोर-शोर से उठी है। निखिल भारत बंगाली समन्वय समिति एवं बंगाली समाज राष्ट्रीय संगठन, बस्तर संभाग (छत्तीसगढ़) के प्रतिनिधिमंडल ने गुरुवार को महामहिम राज्यपाल के नाम कलेक्टर को ज्ञापन सौंपते हुए मांग की कि पुनर्वासित परिवारों को आबंटित भूमि की तत्काल वैधानिक रजिस्ट्री कर उन्हें भूमिस्वामी अधिकार प्रदान किए जाएं।
संगठन का कहना है कि भारत सरकार ने वर्ष 1958 में दंडकारण्य परियोजना के माध्यम से तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान (वर्तमान बांग्लादेश) से आए विस्थापित परिवारों के स्थायी पुनर्वास की योजना बनाई थी। इसके तहत हजारों परिवारों को कृषि भूमि, आवासीय भूखंड, कृषि उपकरण, पशुधन और अन्य आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध कराई गई थीं। इस संबंध में दंडकारण्य विकास प्राधिकरण (DDA), योजना आयोग और पुनर्वास विभाग के सरकारी अभिलेख भी उपलब्ध हैं।
ज्ञापन में कहा गया है कि पुनर्वासित परिवारों ने पिछले लगभग 60 वर्षों में बंजर और वीरान भूमि को अपनी मेहनत से उपजाऊ बनाया। कृषि, मत्स्य पालन, दुग्ध उत्पादन और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने में इन परिवारों ने महत्वपूर्ण योगदान दिया। आज उनकी तीसरी पीढ़ी भी उसी भूमि पर रहकर खेती कर रही है, लेकिन विडंबना यह है कि अधिकांश परिवारों को अब तक उस भूमि का कानूनी मालिकाना हक नहीं मिला।
संगठन ने इसे केवल भूमि का नहीं, बल्कि संवैधानिक अधिकार और सामाजिक न्याय का मुद्दा बताते हुए कहा कि जब परिवार दशकों से उसी भूमि पर निवास और खेती कर रहे हैं, तब उन्हें रजिस्ट्री और भूमिस्वामी अधिकार से वंचित रखना गंभीर चिंता का विषय है। इसके कारण उन्हें बैंक ऋण, सरकारी योजनाओं, उत्तराधिकार और अन्य कानूनी प्रक्रियाओं में लगातार कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है।
ज्ञापन में संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार), अनुच्छेद 21 (जीवन एवं गरिमा का अधिकार) और अनुच्छेद 300A (संपत्ति का अधिकार) का उल्लेख करते हुए मांग की गई है कि दंडकारण्य परियोजना के अंतर्गत आबंटित भूमि की वर्तमान कानूनी स्थिति स्पष्ट की जाए। यदि रजिस्ट्री नहीं हो रही है, तो उसके कानूनी कारण सार्वजनिक किए जाएं और यदि कोई बाधा नहीं है तो पात्र परिवारों की भूमि का तत्काल पंजीयन कर उन्हें भूमिस्वामी अधिकार प्रदान किए जाएं।
संगठन ने यह भी मांग रखी कि यदि इस संबंध में राज्य सरकार के स्तर पर निर्णय आवश्यक है, तो जिला प्रशासन विस्तृत प्रतिवेदन एवं अनुशंसा शीघ्र राज्य शासन को भेजे। साथ ही राजस्व, पंजीयन एवं संबंधित विभागों की संयुक्त बैठक बुलाकर इस छह दशक पुराने मुद्दे का स्थायी समाधान निकाला जाए।
ज्ञापन सौंपने के दौरान निखिल भारत बंगाली समन्वय समिति एवं बंगाली समाज राष्ट्रीय संगठन के संभागीय अध्यक्ष जीवानंद हालदार, महासचिव श्याम घोष, सह सचिव प्रदीप गुहा, मीडिया प्रभारी मृण्मय बारोई सहित तपन दत्ता, गोपाल मलिक, बिजन विश्वास, मिंटू, अनिमेष पाल, राहुल एवं समाज के दर्जनों सदस्य और पदाधिकारी उपस्थित रहे।
संगठन का स्पष्ट संदेश है कि यह किसी नई मांग का आंदोलन नहीं, बल्कि भारत सरकार की पुनर्वास नीति के तहत बसाए गए परिवारों को उनके वैधानिक अधिकार दिलाने की मांग है। उन्होंने केंद्र और राज्य सरकार से आग्रह किया है कि मानवीय और संवैधानिक दृष्टिकोण अपनाते हुए दंडकारण्य परियोजना से जुड़े हजारों परिवारों को शीघ्र भूमि की रजिस्ट्री और भूमिस्वामी अधिकार प्रदान किए जाएं, ताकि छह दशक से चला आ रहा यह लंबित मुद्दा हमेशा के लिए समाप्त हो सके।




