कल तक विरोध, आज वाह-वाह! आखिर ऐसा क्या बदल गया?
लगता है सड़क से ज्यादा तेज़ी से बदल गया माहौल!

पखांजूर।
पखांजूर से दुर्गकोंदल तक की सड़क पर सफर करने वाले लोग आज भी गड्ढों को गिनते-गिनते मंजिल तक पहुंचते हैं। लेकिन इधर कुछ दिनों में एक चीज़ जरूर तेजी से बदली है—
कुछ लोगों का नजरिया।
कल तक सड़क को लेकर विरोध, धरना और नाराज़गी थी। आज वही सड़क अचानक राहत का प्रतीक बताई जा रही है। यह बदलाव देखकर आम लोग भी मुस्कुराते हुए पूछ रहे हैं—
“क्या रातों-रात पूरी सड़क बन गई, या सिर्फ बयान बदल गए?”
बरसात में सड़क पर गड्ढे आज भी अपनी पूरी मौजूदगी दर्ज करा रहे हैं। वाहन चालक अब भी सावधानी से चल रहे हैं, लेकिन प्रेस विज्ञप्तियों में मानो सड़क ने नई ज़िंदगी पा ली हो। लोगों के बीच मज़ाक चल रहा है कि
“सड़क अभी भी पुराने मॉडल की है, बस उसकी तारीफ का नया संस्करण लॉन्च हो गया है।”
कुछ जगह मरम्मत होना अच्छी बात है और उसका स्वागत होना चाहिए। लेकिन दो-चार जगह गिट्टी डाल देने से पूरी सड़क को शानदार बता देना वैसा ही है जैसे छत टपक रही हो और कोई कहे—’दरवाज़ा तो बढ़िया है!’
अब क्षेत्र में एक नया मज़ाक भी चल पड़ा है
—”पखांजूर–दुर्गकोंदल सड़क पर गड्ढे स्थायी हैं, बयान अस्थायी।”
जनता को किसी के पक्ष या विपक्ष की राजनीति नहीं चाहिए। जनता चाहती है कि पूरी सड़क ऐसी बने कि अगली बारिश में फिर से वही कहानी न दोहरानी पड़े। क्योंकि सड़क पर चलने वालों का फैसला प्रेस नोट से नहीं, पहियों के झटकों से होता है।
आखिरकार, सड़क की असली रिपोर्टर जनता है—और जनता की खबर अभी भी गड्ढों से होकर ही गुजर रही है।




