गुरु पूर्णिमा पर मेरे पत्रकारिता गुरु स्वर्गीय सुशील शर्मा जी को श्रद्धापूर्ण नमन

गुरु केवल वह नहीं होता जो पुस्तक का ज्ञान दे, बल्कि वह भी गुरु होता है जो जीवन की राह दिखाए, गिरने पर संभाले और सही-गलत का फर्क समझाए। पत्रकारिता के सफर में मुझे ऐसा ही एक गुरु मिला—स्वर्गीय श्री सुशील शर्मा जी, वरिष्ठ पत्रकार एवं बस्तर बंधु के संपादक।
आज गुरु पूर्णिमा के पावन अवसर पर जब मैं अपने अब तक के पत्रकारिता जीवन पर नजर डालता हूं, तो महसूस करता हूं कि यदि उन्होंने मेरी उंगली पकड़कर पत्रकारिता की बारीकियां न सिखाई होतीं, तो शायद मैं आज इस मुकाम तक नहीं पहुंच पाता। खबर को केवल लिखना नहीं, बल्कि समाज के प्रति जिम्मेदारी के साथ प्रस्तुत करना, निष्पक्षता बनाए रखना और निर्भीक होकर सच कहना—ये सभी संस्कार मुझे उन्हीं से मिले।
उन्होंने कभी केवल शब्दों की पत्रकारिता नहीं सिखाई, बल्कि पत्रकारिता का चरित्र सिखाया। उनके लिए पत्रकारिता कोई व्यवसाय नहीं, बल्कि समाज के प्रति एक पवित्र दायित्व था। उन्होंने हमेशा समझाया कि कलम की ताकत सत्ता से नहीं, सत्य से आती है।
आज वे हमारे बीच शारीरिक रूप से नहीं हैं, लेकिन उनके विचार, उनके संस्कार और उनकी दी हुई सीख आज भी हर कदम पर मेरा मार्गदर्शन करती है। जब भी कोई कठिन निर्णय सामने आता है, उनकी सीख याद आती है और वही मेरे लिए दिशा बन जाती है।
गुरु का ऋण कभी चुकाया नहीं जा सकता। उसे केवल सम्मान, श्रद्धा और उनके बताए मार्ग पर चलकर ही थोड़ा-बहुत निभाया जा सकता है। गुरु पूर्णिमा के इस पावन अवसर पर मैं अपने पूज्य गुरु, स्वर्गीय श्री सुशील शर्मा जी को भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करता हूं और ईश्वर से प्रार्थना करता हूं कि वे उन्हें अपने श्रीचरणों में स्थान दें।




