PV-85 में संदिग्ध डीएपी का मामला: किसान ने ₹2300 में खाद खरीदने का लगाया आरोप, कृषि विभाग ने लिया सैंपल
महाराष्ट्र सीमा से खाद की आवक पर बड़ा सवाल, पूरे क्षेत्र की कृषि व्यवस्था पर उठी उंगली


पखांजूर/PV-85।
परलकोट क्षेत्र में किसानों के बीच खाद की गुणवत्ता और कथित कालाबाजारी को लेकर चिंता अब गंभीर रूप लेती दिखाई दे रही है। पीवी-85 गांव के किसान साधन विश्वास ने संदिग्ध 18:46 डीएपी खाद को लेकर ऑनलाइन शिकायत दर्ज कराई। शिकायत के बाद कृषि विभाग की टीम मौके पर पहुंची, खाद की जांच की और सैंपल लेकर चली गई।

किसान साधन विश्वास के मुताबिक उन्होंने गांव के ही विश्वजीत सरकार नामक व्यक्ति से उक्त खाद खरीदी थी। किसान का आरोप है कि उक्त व्यक्ति महाराष्ट्र से खाद लाकर क्षेत्र में करीब 2300 रुपये प्रति बोरी की दर से बेचता है। साधन विश्वास ने बताया कि उन्होंने अपने दो-तीन अन्य साथियों के साथ खाद खरीदी और धान की फसल में इसका इस्तेमाल किया। लेकिन खाद डालने के करीब एक महीने बाद भी फसल में अपेक्षित बढ़वार और जान नजर नहीं आई, जिसके बाद उन्हें खाद की गुणवत्ता पर संदेह हुआ और उन्होंने ऑनलाइन शिकायत की।
शिकायत के बाद हरकत में आया कृषि विभाग
ऑनलाइन शिकायत के बाद स्थानीय कृषि विभाग के अधिकारी मौके पर पहुंचे। टीम ने संबंधित खाद को देखा और सैंपल जांच के लिए अपने साथ ले गई। किसान को खाद की गुणवत्ता की जांच के बाद आवश्यक कार्रवाई का भरोसा भी दिया गया।
अब निगाहें जांच रिपोर्ट पर टिकी हैं। यदि खाद अमानक या नकली पाई जाती है तो यह सिर्फ एक किसान को बेची गई खाद का मामला नहीं रहेगा, बल्कि पूरे क्षेत्र में ऐसी खाद की आपूर्ति की जांच का रास्ता खुलेगा।

बोर्ड पर अधिकारी का पद साफ, फिर निगरानी व्यवस्था पर सवाल क्यों?
पीवी-85 में लगा बोर्ड खुद इस मामले की गंभीरता को सामने लाता है। बोर्ड पर “वरिष्ठ कृषि विकास अधिकारी, विकासखंड कोयलीबेड़ा, लिंक कार्यालय-पखांजूर” अंकित है। यानी क्षेत्र की कृषि व्यवस्था से संबंधित यह जिम्मेदारी पखांजूर स्थित कार्यालय से संचालित होने वाले वरिष्ठ कृषि विकास अधिकारी के अधीन है।
ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि जब कृषि विभाग का पूरा स्थानीय तंत्र किसानों तक पहुंचने के लिए मौजूद है, तो महाराष्ट्र सीमा से संदिग्ध खाद आने और गांवों में उसकी बिक्री की जानकारी विभाग को पहले क्यों नहीं मिलती?
हर गांव में किसान मित्र, फिर भी विभाग तक खबर क्यों नहीं?
सरकार ने किसानों तक कृषि विभाग की योजनाओं और कृषि संबंधी जानकारी पहुंचाने के लिए गांव स्तर पर व्यवस्था बनाई है। इसके बावजूद यदि किसी गांव में बाहर से खाद लाकर खुले तौर पर बिक्री की जा रही है, तो इसकी जानकारी समय रहते विभाग तक नहीं पहुंचना निगरानी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
किसान का कहना है कि उसने नुकसान महसूस होने के बाद शिकायत की। सवाल यह है कि अगर किसान शिकायत नहीं करता तो क्या ऐसी खाद की बिक्री यूं ही चलती रहती?
महाराष्ट्र सीमा नजदीक, खाद की आवाजाही पर निगरानी कौन करेगा?
परलकोट क्षेत्र महाराष्ट्र सीमा के नजदीक है। ऐसे में बाहर से आने वाली खाद की वैधता, गुणवत्ता, बिल, स्रोत और बिक्री प्रक्रिया की जांच बेहद जरूरी है। यदि जांच में पीवी-85 की खाद अमानक या नकली साबित होती है, तो केवल एक विक्रेता पर कार्रवाई पर्याप्त नहीं होगी।
यह भी पता लगाया जाना चाहिए कि खाद महाराष्ट्र से कहां से लाई गई, किसके माध्यम से क्षेत्र में पहुंची और कितने किसानों को इसकी बिक्री की गई।
अब किसान सिर्फ सैंपल रिपोर्ट नहीं, कार्रवाई चाहता है
पीवी-85 के किसान की शिकायत अब पूरे परलकोट क्षेत्र के किसानों की चिंता बन चुकी है।
किसानों का सवाल सीधा है—
“हम मेहनत करके फसल उगाएं और बाजार से महंगी खाद खरीदने के बाद वही खाद हमारी फसल को नुकसान पहुंचा दे, तो इसकी जिम्मेदारी कौन लेगा?”

अब कृषि विभाग के सामने चुनौती सिर्फ सैंपल लेने की नहीं, बल्कि जांच रिपोर्ट सामने लाकर दोषी पाए जाने वालों पर कार्रवाई करने और क्षेत्र में खाद की अवैध/अमानक बिक्री पर प्रभावी निगरानी सुनिश्चित करने की है।
किसान को खाद के नाम पर धोखा नहीं चाहिए। पीवी-85 की यह शिकायत अगर सही साबित होती है, तो यह पूरे परलकोट की कृषि व्यवस्था के लिए लाल झंडा है




