रसोईघर में सिमटी शिक्षा की तस्वीर, ढोरकट्टा के नौनिहाल पूछ रहे— हमारा स्कूल कब बनेगा ?
सरकारी दावों की खुली पोल: जर्जर स्कूल भवन में पढ़ने की जगह रसोईघर बना ‘कक्षा’, नौनिहालों के भविष्य से खिलवाड़ !

कांकेर/पखांजूर।
सरकार शिक्षा के अधिकार, बेहतर शैक्षणिक वातावरण और बच्चों के सुरक्षित भविष्य की बात करती है, लेकिन जमीनी हकीकत कई बार इन दावों की तस्वीर बिल्कुल उलट दिखाती है। कांकेर जिले के विकासखंड कोयलीबेड़ा अंतर्गत ग्राम पंचायत ढोरकट्टा में शासकीय प्राथमिक शाला की बदहाल स्थिति इसका जीता-जागता उदाहरण बनकर सामने आई है। ग्राम ढोरकट्टा स्थित शासकीय प्राथमिक शाला का पुराना भवन अब इस कदर जर्जर और निष्प्रयोज्य हो चुका है कि उसमें बच्चों को बैठाना भी जोखिम से खाली नहीं है। भवन की हालत ऐसी है कि मरम्मत के बजाय अब नए भवन के निर्माण की आवश्यकता महसूस की जा रही है। बावजूद इसके, विद्यालय के नौनिहालों की पढ़ाई का सिलसिला किसी तरह जारी है।
जहां भोजन पकना चाहिए, वहीं चल रही बच्चों की ‘कक्षाएं’
विद्यालय भवन उपयोग के लायक नहीं बचने के कारण कक्षा पहली से पांचवीं तक के बच्चों को रसोईघर में बैठाकर पढ़ाई कराई जा रही है। जिस स्थान पर बच्चों के लिए मध्यान्ह भोजन तैयार होना चाहिए, उसी सीमित और तंग जगह में पांच कक्षाओं के छोटे-छोटे बच्चों को पढ़ने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है।
एक तरफ बच्चों की संख्या, दूसरी तरफ सीमित जगह और ऊपर से पढ़ाई का दबाव—ऐसे माहौल में न तो बच्चे सहज होकर पढ़ाई कर सकते हैं और न ही शिक्षक उन्हें अपेक्षित शैक्षणिक वातावरण दे सकते हैं।
यह महज विद्यालय भवन की समस्या नहीं, बल्कि बच्चों के अधिकार, सुरक्षा और शिक्षा की गुणवत्ता से जुड़ा गंभीर सवाल है।
जर्जर भवन के बाद भी नया भवन क्यों नहीं?
ग्रामीणों और अभिभावकों का कहना है कि जब पुराना भवन बच्चों के बैठने योग्य नहीं है तो आखिर नए भवन के निर्माण की दिशा में अब तक ठोस पहल क्यों नहीं हुई? क्या किसी बड़े हादसे का इंतजार किया जा रहा है?
सरकार और शिक्षा विभाग द्वारा स्कूलों में बेहतर अधोसंरचना उपलब्ध कराने के दावे किए जाते हैं, लेकिन ढोरकट्टा की तस्वीर उन दावों के सामने कई सवाल खड़े करती है। नौनिहालों के लिए सुरक्षित भवन उपलब्ध कराना सरकार और संबंधित विभाग की जिम्मेदारी है, कोई एहसान नहीं।
देश के भविष्य को रसोईघर में बैठाकर कैसे गढ़ेंगे?
जिन बच्चों को आधुनिक और सुरक्षित विद्यालयों में शिक्षा मिलनी चाहिए, वे आज रसोईघर की तंग जगह में बैठकर पढ़ने को मजबूर हैं। यह स्थिति केवल असुविधाजनक नहीं, बल्कि व्यवस्था के लिए गंभीर आत्ममंथन का विषय है।

आज यही बच्चे कल देश का भविष्य बनेंगे। ऐसे में सवाल यह है कि जब उनके वर्तमान को ही सुरक्षित और सम्मानजनक शैक्षणिक वातावरण नहीं मिल रहा, तो हम उनसे उज्ज्वल भविष्य की उम्मीद कैसे कर सकते हैं?
प्रशासन से तत्काल हस्तक्षेप की मांग

स्थानीय ग्रामीणों एवं अभिभावकों ने जिला प्रशासन और शिक्षा विभाग से मामले में तत्काल संज्ञान लेने की मांग की है। ग्रामीणों का कहना है कि विद्यालय के लिए नए भवन की स्वीकृति और निर्माण की प्रक्रिया में अनावश्यक देरी न की जाए तथा जब तक नया भवन तैयार नहीं हो जाता, तब तक बच्चों की पढ़ाई के लिए किसी सुरक्षित और पर्याप्त वैकल्पिक स्थान की व्यवस्था की जाए।
अभिभावकों का कहना है कि बच्चों की सुरक्षा से किसी भी परिस्थिति में समझौता नहीं किया जाना चाहिए। शिक्षा केवल किताब और ब्लैकबोर्ड तक सीमित नहीं है, बल्कि बच्चों को सुरक्षित, सम्मानजनक और स्वस्थ वातावरण उपलब्ध कराना भी शिक्षा व्यवस्था का अभिन्न हिस्सा है।

अब देखना यह होगा कि ढोरकट्टा के नौनिहालों की यह तस्वीर जिम्मेदार अधिकारियों की संवेदना जगाती है या फिर सरकारी फाइलों के बीच दबकर रह जाती है।




