परलकोट में नेताओं का ‘डबल रोल’! सुबह भारी वाहनों का विरोध, शाम को गड्ढों का लोकार्पण
सड़क कन्फ्यूज, जनता कन्फ्यूज... नेता बिल्कुल नहीं - नो कन्फ्यूज

पखांजूर।
परलकोट क्षेत्र की राजनीति इन दिनों किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं लग रही। एक तरफ मंच से जोश के साथ कहा जा रहा है कि
“भारी वाहन इस मार्ग से नहीं चलने चाहिए, जनता परेशान है।”
दूसरी तरफ वही सड़क, वही गड्ढे और उसी मार्ग पर मरम्मत का काम शुरू होते ही कुछ चेहरे मुस्कुराते हुए फोटो खिंचवाते नजर आने लगते हैं।
अब बेचारी जनता करे तो क्या करे?
सुबह सुनती है कि भारी वाहन बंद होने चाहिए, शाम को सुनती है कि गड्ढे भरना विकास का नया अध्याय है। उधर सड़क सोच रही होगी—
“भाई, पहले तय तो कर लो कि मुझे बचाना है या सिर्फ मेरे साथ फोटो खिंचवाना है!”
पखांजूर से दुर्गकोंदल तक रोज सफर करने वाले लोग कहते हैं कि सड़क की असली रिपोर्ट प्रेस नोट से नहीं, वाहन के शॉक एब्जॉर्बर से मिलती है। गड्ढे आज भी वहीं हैं, बस उनके साथ फोटो खिंचवाने वालों की संख्या बढ़ गई है।
अब क्षेत्र में एक नया मजाक चल पड़ा है—
“नेताओं के बयान मौसम विभाग की भविष्यवाणी से भी तेज बदलते हैं।”
किसी का कहना है कि माइंस के भारी वाहन सड़क खराब कर रहे हैं। कोई कहता है कि मरम्मत हो रही है, इसलिए सब ठीक है। जनता पूछ रही है—
“आखिर असली कहानी कौन-सी है? विरोध वाली या फोटो वाली?”
सड़क भी शायद मन ही मन कह रही होगी—
“मुझे भाषण नहीं, डामर चाहिए। मुझे पोस्ट नहीं, मजबूत निर्माण चाहिए।”
आज परलकोट की जनता किसी नेता के पक्ष या विपक्ष में नहीं, बल्कि एक सीधा सवाल पूछ रही है—
यदि सड़क इतनी अच्छी हो गई है, तो फिर भारी वाहनों का विरोध क्यों? और यदि भारी वाहनों से परेशानी है, तो केवल कुछ जगह गड्ढे भर देने से समस्या खत्म कैसे हो गई?
फिलहाल ऐसा लग रहा है कि सड़क पर कम, बयानों में ज्यादा ट्रैफिक जाम है। जनता बस यही इंतजार कर रही है कि कभी तो ऐसा दिन आए, जब सड़क की हालत और नेताओं के बयान—दोनों एक ही दिशा में चलते नजर आएं।
“परलकोट की राजनीति का नया ट्रैफिक नियम—नेता अपनी-अपनी लेन में, जनता गड्ढों वाली मेन रोड में!”




