मैं हूँ महाशक्तिशाली सूरजागढ़ माइंस का ट्रक… सड़क देखकर नहीं, सड़क मुझे देखकर संभलती है !
सूरजगढ़ माइंस का ट्रक बोले — रास्ता मेरा, गड्ढा तुम्हारा !

पखांजूर।
“नमस्कार!
मैं हूँ महाशक्तिशाली सूरजागढ़ माइंस का ट्रक।
मेरे पहिए सिर्फ घूमते नहीं, चर्चा भी करवाते हैं। सड़क चाहे नई हो या पुरानी, मुझे देखकर सबसे पहले उसका आत्मविश्वास डगमगा जाता है।”
सुबह होते ही मेरा इंजन गरजता है और सड़क मन ही मन प्रार्थना करती है—”हे डामर देवता! आज मुझे बचा लेना।”
मैं निकलता हूँ तो लोग साइड लेते हैं, बाइक वाले धीरे हो जाते हैं और सड़क सोचती है—”लो, आज फिर मेरी परीक्षा शुरू!”
उधर पीडब्ल्यूडी भी शायद कैलेंडर देखकर काम करता होगा। बरसात आई, सड़क टूटी। सड़क टूटी, गिट्टी आई। गिट्टी आई, फोटो खिंची। फोटो खिंची, खबर छपी। फिर मैं आया… और कहानी वहीं से दोबारा शुरू!
सड़क भी अब तंज मारने लगी है—
“मेरी मरम्मत से ज्यादा तो मेरी मरम्मत की खबरें मजबूत हैं।”
इधर जनता का भी अपना हास्य है। कोई कहता है
—”यह सड़क नहीं, ट्रकों का फिटनेस टेस्ट है।” दूसरा बोलता है—”गाड़ी का शॉक एब्जॉर्बर नहीं, चालक का धैर्य मजबूत होना चाहिए।”
सबसे मजेदार बात यह है कि सड़क हर साल सजती भी है और हर साल बिखरती भी है। लगता है सड़क और मरम्मत का रिश्ता किसी टीवी सीरियल जैसा हो गया है—एपिसोड बदलता है, कहानी नहीं
अब लोग नई सोच की बात करने लगे हैं। सवाल यह नहीं कि गड्ढे कब भरेंगे, सवाल यह है कि ऐसा स्थायी समाधान कब होगा जिससे सड़क पर भारी दबाव कम हो। कई लोग रेल परिवहन जैसे विकल्पों पर भी चर्चा कर रहे हैं, ताकि सड़क और आम लोगों—दोनों को राहत मिल सके।
“सड़क बोली—मुझे हर साल मत सजाओ, बस इतना कर दो कि मैं हर मौसम में बिना डरे खड़ी रह सकूँ। बाकी ट्रकों से मेरी दोस्ती प्रशासन बाद में करवा देना!”




