सड़क बोली– मुझे 15 टन के लिए बनाया था, 70 टन वालों ने तो मेरी किस्मत ही बदल दी!
मरौड़ा–छत्तीसगढ़–महाराष्ट्र बॉर्डर मार्ग की सड़क इन दिनों शायद खुद अपनी आत्मकथा लिखना चाहती होगी।

पियूष मंडल
पखांजूर
कहते हैं कि इस सड़क को सीमित भार क्षमता को ध्यान में रखकर बनाया गया था, लेकिन आज इस पर कहीं अधिक भार क्षमता वाले भारी वाहन गुजरते दिखाई देते हैं। नतीजा यह है कि सड़क जगह-जगह से ऐसी टूट गई है कि गड्ढे भी अब खुद को सड़क का स्थायी निवासी मानने लगे हैं।
अगर सड़क बोल पाती तो शायद कहती—
“मुझे तो 8–15 टन के हिसाब से बनाया गया था, ये 55–70 टन वाले मेहमान किसने भेज दिए?”

उधर पीडब्ल्यूडी शायद सोच रहा होगा—
“मरम्मत करेंगे… फिर टूटेगी… फिर मरम्मत करेंगे… यही तो विकास का चक्र है!”
स्थानीय लोग भी अब मजाक में कहने लगे हैं कि इस सड़क पर गाड़ी नहीं, किस्मत का सस्पेंशन टेस्ट होता है। जो बिना झटके निकल गया, समझो उसका दिन शुभ है।
सबसे दिलचस्प बात यह है कि सड़क हर दिन टूटती है, लोग हर दिन शिकायत करते हैं, फोटो हर दिन खिंचते हैं और बयान भी हर दिन आते हैं। लेकिन गड्ढे हैं कि कहते हैं—
“हम कहीं नहीं जाने वाले, हमारी पोस्टिंग पक्की है।”
अब जनता पूछ रही है कि यदि सड़क की डिजाइन क्षमता एक सीमा तक है, तो उस पर चलने वाले भारी वाहनों के संबंध में नियमों का पालन कैसे सुनिश्चित किया जा रहा है? क्या सड़क की क्षमता, यातायात और रखरखाव की समीक्षा समय-समय पर हो रही है?
परलकोट का नया पर्यटन स्थल—’गड्ढा दर्शन मार्ग’।
यहाँ सड़क कम और सरप्राइज़ ज्यादा मिलते हैं।”




