लगता है परलकोट में नेताओं का GPS फिर से रूट बदल गया!
कल तक विकास की स्पीड, आज भारी वाहनों पर ब्रेक... जनता बोली—"साहब! आखिर असली रूट कौन-सा है?"

पखांजूर।
परलकोट क्षेत्र की राजनीति इन दिनों किसी कॉमेडी फिल्म से कम नहीं लग रही। कुछ दिन पहले तक मंचों और बयानों में कहा जा रहा था कि माइंस से क्षेत्र का विकास होगा, सड़कें बेहतर होंगी, पुल-पुलिया बनेंगे और क्षेत्र नई ऊंचाइयों पर पहुंचेगा। सड़क पर कहीं-कहीं गिट्टी डाली गई, मरम्मत हुई, फोटो खिंचे और लगा कि मानो विकास ने परलकोट का पता ढूंढ लिया हो।
लेकिन कुछ ही दिनों बाद कहानी ने ऐसा मोड़ लिया कि जनता का GPS ही घूम गया।
अब वही सड़क, वही भारी वाहन और वही मार्ग अचानक चर्चा का विषय बन गए। जिला प्रशासन को आवेदन दिया गया कि परलकोट की लाइफलाइन सड़क पर भारी वाहनों के संचालन की समीक्षा की जाए।
अब आम लोग चाय की दुकान पर बैठकर मुस्कुरा रहे हैं—
“लगता है नेताओं का GPS फिर से नया रूट पकड़ चुका है!”
इधर सड़क की हालत भी किसी से छिपी नहीं है। जगह-जगह उखड़ी सतह, गड्ढे और भारी वाहनों के गुजरने पर उड़ती धूल लोगों के सामने है।
आपकी तस्वीरों जैसी स्थिति देखकर लोग मजाक में कहते हैं—
“यह सड़क नहीं, धूल एक्सप्रेस का प्लेटफॉर्म है।”
जब कोई भारी ट्रक गुजरता है तो पीछे धूल का बादल उठता है।
राहगीर कहते हैं—”यहां सफर मुफ्त नहीं मिलता, साथ में धूल का पैकेज भी मिलता है।”
अब जनता का सवाल भी सीधा है। यदि पहले सब कुछ ठीक था तो अचानक चिंता क्यों बढ़ी? और यदि चिंता वाजिब है, तो फिर केवल बयान देने से आगे बढ़कर स्थायी समाधान की दिशा में क्या कदम उठाए जा रहे हैं?
सड़क बेचारी भी शायद मन ही मन कह रही होगी-
“कभी मेरे साथ फोटो, कभी मेरे नाम पर बयान… कोई मुझे ठीक भी करवा दो!”
उधर पीडब्ल्यूडी की ओर लोगों की नजरें हैं कि सड़क का दीर्घकालीन रखरखाव और सुरक्षा कैसे सुनिश्चित होगी। वहीं प्रशासन से अपेक्षा है कि सड़क की क्षमता, यातायात का दबाव और स्थानीय लोगों की सुरक्षा जैसे मुद्दों पर स्पष्ट और प्रभावी कार्रवाई दिखाई दे।
चाय की दुकान पर बैठे एक बुजुर्ग ने हंसते हुए कहा—
“परलकोट में सड़क से ज्यादा तेज अगर कुछ बदलता है, तो वह है नेताओं का बयान। सड़क आज भी वहीं है, गड्ढे भी वहीं हैं, बस प्रेस नोट बदल गया।”
एक युवक ने तुरंत जवाब दिया—
“पहले फोटो में गिट्टी दिखती थी, अब आवेदन दिख रहा है। जनता को बस मजबूत सड़क दिखा दो, वही काफी है।”
परलकोट का नया ट्रैफिक नियम—नेताओं का रूट कभी भी बदल सकता है, लेकिन सड़क का गड्ढा अपनी जगह से नहीं हिलता।”
और जनता की मुस्कुराती टिप्पणी—
“हमें बयान नहीं चाहिए, ऐसी सड़क चाहिए जिस पर गाड़ी भी चले, बच्चे भी सुरक्षित स्कूल जाएं और धूल का बादल देखकर मौसम का अनुमान न लगाना पड़े।”




