खनिज महाराष्ट्र का, धूल-गड्ढे छत्तीसगढ़ के! सूरजगढ़ माइंस की गाड़ियों से नुकसान हमारा, फायदा किसका?

पखांजूर।
परलकोट क्षेत्र में सूरजगढ़ माइंस की भारी वाहनों की लगातार आवाजाही को लेकर अब एक बड़ा सवाल सामने आ रहा है—खनन महाराष्ट्र के गड़चिरौली जिले में हो रहा है, लेकिन उसका भारी परिवहन छत्तीसगढ़ की सड़कों से हो रहा है तो इस नुकसान की भरपाई कौन करेगा?
सूरजगढ़ माइंस गड़चिरौली जिले में स्थित है और वहां जिला खनिज प्रतिष्ठान (DMF) भी संचालित है। सरकारी जानकारी के अनुसार DMF का उद्देश्य खनन प्रभावित क्षेत्रों और लोगों के विकास व कल्याण के लिए काम करना है।
ऐसे में परलकोट क्षेत्र में उठ रहा सवाल गंभीर है—माइंस की गाड़ियां छत्तीसगढ़ की सड़कों पर दौड़ें, सड़कें समय से पहले खराब हों, धूल और यातायात की परेशानी स्थानीय लोग झेलें, तो इस नुकसान का हिसाब कौन देगा?

मरोड़ा से महाराष्ट्र सीमा तक हाल ही में बनी सड़क पर भारी वाहनों के दबाव को लेकर भी लगातार सवाल उठ रहे हैं। लोगों का कहना है कि सड़क जितने वर्षों तक चलनी चाहिए थी, उससे पहले ही भारी वाहनों की आवाजाही के कारण उसकी हालत खराब होती जा रही है। बीच-बीच में गड्ढों में गिट्टी डालकर मरम्मत जरूर दिखाई देती है, लेकिन क्या यह स्थायी समाधान है या सिर्फ खानापूर्ति?
नौकरी के नाम पर कुछ लोग, लेकिन नुकसान पूरे क्षेत्र का?
माइंस से जुड़े कुछ लोगों को स्थानीय स्तर पर रोजगार मिलने की बात अपनी जगह है –
क्या कुछ लोगों को नौकरी मिल जाने से पूरे परलकोट क्षेत्र लाइफ लाइन वाली सड़क, धूल, यातायात और सुरक्षा की परेशानी खत्म हो जाती है?
स्थानीय लोगों की मांग है कि क्षेत्र के अस्पतालों, एंबुलेंस, यातायात सुरक्षा और सड़क व्यवस्था में भी ठोस योगदान दिखाई देना चाहिए।
माइंस की गाड़ियां दौड़ रहीं हजारों में, अस्पताल के लिए एक एंबुलेंस भी भारी?
परलकोट क्षेत्र में सूरजगढ़ माइंस की भारी वाहनों की लगातार आवाजाही के बीच स्थानीय लोग अब स्वास्थ्य सुविधाओं को लेकर भी सवाल उठा रहे हैं। क्षेत्रवासियों का कहना है कि जब माइंस का परिवहन इस इलाके की सड़कों पर लगातार हो रहा है और रोजाना बड़ी संख्या में भारी वाहन गुजर रहे हैं, तो क्या माइंस प्रबंधन क्षेत्र के किसी एक अस्पताल को ही गोद लेकर स्वास्थ्य सुविधाओं को मजबूत नहीं कर सकता?
जनता का सवाल यह भी है कि सड़क पर भारी वाहनों से किसी दिन कोई बड़ा हादसा हो जाए तो तत्काल उपचार और मरीज को अस्पताल पहुंचाने की व्यवस्था कितनी मजबूत है? ऐसे में माइंस प्रबंधन द्वारा एक नई, पूरी तरह फिट और अत्याधुनिक एंबुलेंस उपलब्ध कराना कोई बहुत बड़ी मांग नहीं होनी चाहिए।
लोगों का कहना है कि गड्ढों में थोड़ी गिट्टी डालने और फोटो खिंचवाने से आगे बढ़कर अगर एक अस्पताल को वास्तविक स्वास्थ्य सुविधाओं से जोड़ दिया जाए, तो उसका फायदा सीधे आम जनता को मिलेगा।
“माइंस की गाड़ियों के पहिए 24 घंटे घूम सकते हैं, लेकिन जनता के लिए एक अच्छी एंबुलेंस की व्यवस्था क्यों नहीं घूम पा रही?”
अब परलकोट की जनता पूछ रही है—माइंस का कारोबार जितना बड़ा है, क्या उसमें से जनता की जिंदगी बचाने के लिए एक एंबुलेंस की जगह भी नहीं निकल सकती?




