मुक्तिधामों की हालत देखिए… मौत के बाद भी ‘विकास’ का इंतजार!
कहीं रास्ता गड्ढों में गुम, कहीं पानी-बैठने की सुविधा गायब; 15 अगस्त पर झंडा जरूर लहराएगा, लेकिन मुक्तिधाम की बदहाली पर कौन ध्यान देगा?

पखांजूर।
नगर पंचायत पखांजूर में विकास की तस्वीर देखनी हो तो कभी-कभी मुख्य सड़क छोड़कर सीधे मुक्तिधाम की ओर भी जाना चाहिए। आखिर यहां पहुंचने के लिए जनता को जीवन में एक बार ही जाना होता है, शायद इसी वजह से जिम्मेदारों ने सोचा होगा कि “रास्ता और सुविधा ठीक करने की जल्दी भी क्या है!”
मंडी के पास स्थित मुक्तिधाम की तस्वीरें खुद इसकी कहानी बयां कर रही हैं। मुक्तिधाम तक पहुंचने वाला रास्ता बड़े-बड़े गड्ढों और उखड़े पत्थरों से भरा पड़ा है। हालत ऐसी है कि अंतिम यात्रा में शामिल लोगों को भी रास्ते पर संभल-संभलकर चलना पड़े। पानी की व्यवस्था के नाम पर एक बोरिंग जरूर है, लेकिन बताया जा रहा है कि वह भी मंडी की व्यवस्था से जुड़ी है। यानी मुक्तिधाम के लिए अलग से व्यवस्था करना शायद नगर पंचायत की प्राथमिकता सूची में अभी ऊपर नहीं आया है।
यह क्षेत्र नगर पंचायत पखांजूर के वार्ड क्रमांक-1 के अंतर्गत आता है। बावजूद इसके स्थानीय पार्षद और नगर पंचायत अध्यक्ष का इस ओर ध्यान नहीं जाना लोगों के बीच चर्चा का विषय बना हुआ है। जनता व्यंग्य में कह रही है—“जब जाना ही मरने के बाद है तो रास्ता आज ठीक करवाकर क्या फायदा!”

दूसरा मुक्तिधाम तो जैसे ‘राम भरोसे’
नगर पंचायत पखांजूर के अंजलि नल के पास स्थित मुक्तिधाम की हालत भी किसी से छिपी नहीं है। यहां न पर्याप्त पानी की व्यवस्था है, न बैठने की सुविधा और न ही परिसर की समुचित देखरेख। ऊपर का छत भी जर्जर हालत में दिखाई दे रहा है, जिसे देखकर लगता है कि नीचे बैठने वाला व्यक्ति अंतिम संस्कार के बजाय पहले छत की सलामती की प्रार्थना करने लगे!
सबसे मजेदार बात यह है कि कल 15 अगस्त है। स्वतंत्रता दिवस पर बड़े-बड़े नेता पखांजूर सुभाष चंद्र बोस स्टेडियम में आएंगे और झंडा फैलाएंगे और झंडे लगाए जाएंगे, तिरंगा शान से लहराएगा और कार्यक्रम भी होंगे।
लेकिन सवाल यह है कि मुक्तिधाम की बदहाली कब आजाद होगी?
जनता का कहना है कि तिरंगा हर जगह सम्मान से लहरना चाहिए, लेकिन उसके साथ उन सार्वजनिक स्थलों की हालत भी सुधरनी चाहिए जहां आम लोगों को बुनियादी सुविधाओं की जरूरत होती है।
नगर पंचायत से सवाल सीधा है—
मुक्तिधाम में पानी, बैठने की व्यवस्था, छत की मरम्मत और आने-जाने के रास्ते के लिए आखिर कब बजट और ध्यान मिलेगा?
या फिर जिम्मेदारों का फार्मूला यही है—“जीते जी सुविधा की जरूरत है, मरने के बाद जनता खुद रास्ता ढूंढ लेगी!”




